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आत्मकथात्मक संस्मरण

बाढ़ै पुत्र पिता के धरमा'                                              संस्मरण                                        लखनलाल पाल               अगर आप किसी को मन से निकालना चाहते हो तो उसे कागज पर लिख डालिए। यह मेरा अपना अनुभव है। मैंने ऐसी बहुत सी स्मृतियां कागज पर लिखकर मिटाई है। इसे मैं मुक्ति समझता हूं ।जीवन में मुक्त होते चले जाना और फिर अन्य से जुड़ते जाना एक कुदरती प्रक्रिया है। आज मैं भी अपने पिता से मुक्त होना चाहता हूं। इसलिए मैं उन पर लिख रहा हूं।                   मैं अपने लिए भी यही चाहता हूं। मेरे जाने के बाद मुझे कोई याद न रखे । याद भी एक बोझ है। इस बोझ को जितनी जल्दी हो उतार देना चाहिए। जब ये उतरेगा तभी तो  आने वाले इस बोझ को वहन कर पाएंगे ।           ...